पाठ्यक्रम: GS2,अंतरराष्ट्रीय संबंध/ GS3,अर्थव्यवस्था, विज्ञान और प्रौद्योगिकी
समाचार में
- प्रौद्योगिकी क्षेत्र की अग्रणी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट, सिंगटेल, टाटा कम्युनिकेशंस तथा एआई कनेक्टिविटी मंच लाइटस्टॉर्म के एक संघ द्वारा भारत, मलेशिया और सिंगापुर को जोड़ने वाली एक नई सबमरीन केबल प्रणाली का निर्माण किया जाएगा।
I-2SEA: सबमरीन केबल प्रणाली
- मार्ग एवं संरचना : यह प्रणाली भारत के पूर्वी तट को, जहाँ हैदराबाद एवं चेन्नई में तीव्र गति से विकसित हो रहे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा हाइपरस्केलर डेटा सेंटर समूह स्थित हैं, सीधे सिंगापुर से जोड़ेगी, जो इस क्षेत्र का प्रमुख क्लाउड इंटरकनेक्ट एवं एआई हब है। साथ ही यह कुआलालंपुर (मलेशिया) के उभरते डेटा सेंटर कॉरिडोर को भी जोड़ेगी।
- भारत में इसके दो लैंडिंग स्टेशन स्थापित किए जाएंगे—
- पहला मछलीपट्टनम में, जो समुद्र के अंदर से हैदराबाद तक सबसे कम दूरी वाला संपर्क उपलब्ध कराएगा।
- दूसरा दक्षिण चेन्नई में एक नए एवं वैकल्पिक लैंडिंग स्थल पर स्थापित किया जाएगा।
- भारत में इसके दो लैंडिंग स्टेशन स्थापित किए जाएंगे—
- उद्देश्य : यह प्रणाली हाइपरस्केलर कंपनियों, जीपीयू (GPU) अवसंरचना प्रदाताओं तथा भारत-दक्षिण-पूर्व एशिया गलियारे में एआई प्रशिक्षण एवं अनुमान कार्यभार संचालित करने वाले उद्यमों की तीव्र गति से बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए विकसित की जा रही है।
- इसका उद्देश्य विशेष रूप से हैदराबाद, चेन्नई एवं सिंगापुर जैसे प्रमुख डेटा सेंटर केंद्रों के मध्य उच्च मांग वाले एआई कार्यभार का तीव्र एवं विश्वसनीय डेटा संचार सुनिश्चित करना है।
- समय-सीमा : I-2SEA प्रणाली के वर्ष 2029 तक सेवा हेतु तैयार होने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
- इस उच्च क्षमता वाली केबल की अनुमानित लंबाई सिंगापुर से मछलीपट्टनम तक लगभग 3,600 किमी होगी, जिसके बाद हैदराबाद तक स्थलीय संपर्क उपलब्ध कराया जाएगा।
- यह प्रणाली सिंगापुर/मलेशिया–हैदराबाद कॉरिडोर में सर्वाधिक तीव्र डेटा संचरण उपलब्ध कराने की अपेक्षा की जा रही है, जो क्षेत्र में एआई कार्यभार के लिए सर्वाधिक सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण संपर्क मार्गों में से एक है।
अंडर-सी केबल (सबमरीन केबल)
- ये केबल विश्व की इंटरनेट प्रणालियों को जोड़ने वाला प्रमुख माध्यम हैं।
- ये विभिन्न देशों के इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (ISPs) तथा दूरसंचार संचालकों को परस्पर जोड़ते हैं।
- ये मोटी, अत्यधिक सुरक्षित फाइबर-ऑप्टिक केबलें समुद्र तल पर बिछाई जाती हैं तथा अत्यधिक गति से विशाल मात्रा में डेटा का संचार करती हैं।
- ये समुद्र तट पर स्थित लैंडिंग स्टेशनों (Landing Stations) से जुड़ती हैं, जो इन्हें देश के आंतरिक दूरसंचार नेटवर्क से जोड़ते हैं।
- स्थलीय केबलों एवं मोबाइल संचार टावरों के साथ मिलकर ये उपयोगकर्ताओं को इंटरनेट सुविधा उपलब्ध कराती हैं।
लाभ
- डिजिटल अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन: अंडर-सी केबल भारत की तीव्र गति से विकसित हो रही डिजिटल अर्थव्यवस्था की आधारभूत संरचना हैं।
- ये फिनटेक, ई-कॉमर्स तथा सूचना प्रौद्योगिकी (IT) सेवाओं के निर्यात हेतु विशाल मात्रा में डेटा का तीव्र एवं सुरक्षित संचार सुनिश्चित करती हैं।
- वित्तीय व्यापार तथा क्लाउड-से-क्लाउड समकालिकता जैसे वास्तविक समय आधारित अनुप्रयोगों के लिए उच्च गति एवं उच्च क्षमता वाले डेटा नेटवर्क आवश्यक हैं।
- एआई एवं डेटा सेंटर का विस्तार: बड़े पैमाने पर एआई प्रशिक्षण तथा क्लाउड नेटवर्क के लिए वितरित डेटा सेंटर समूह अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
- इन केंद्रों की बढ़ती आवश्यकताओं के कारण अत्यधिक बैंडविड्थ की मांग उत्पन्न हो रही है, जिसे पूरा करने के लिए आगामी पीढ़ी की अंडर-सी केबलों की आवश्यकता है।
- घरेलू एवं क्षेत्रीय समावेशन: चेन्नई-अंडमान एवं निकोबार द्वीप (CANI) केबल तथा कोच्चि-लक्षद्वीप द्वीप (KLI) केबल जैसी स्वदेशी परियोजनाओं ने दूरस्थ द्वीपीय क्षेत्रों को उच्च गति ब्रॉडबैंड नेटवर्क से जोड़कर राष्ट्रीय सुरक्षा तथा स्थानीय आर्थिक एकीकरण को सुदृढ़ किया है।
- भू-राजनीतिक एवं समुद्री प्रभाव: प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संघों की सबमरीन केबल परियोजनाओं के केंद्र के रूप में भारत का उभरना, उसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण डिजिटल ट्रांजिट हब तथा यूरोप, पश्चिम एशिया एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के मध्य सेतु के रूप में स्थापित कर रहा है।
संवेदनशीलताएँ एवं चुनौतियाँ
- क्षति की संवेदनशीलता: अंडर-सी केबलें मछली पकड़ने वाले ट्रॉलरों, जहाजों के लंगर, भूकंप, अंडर-सी भूस्खलन तथा चरम मौसमीय घटनाओं से क्षतिग्रस्त हो सकती हैं।
- अधिकांश तकनीकी दोष उथले तटीय जल क्षेत्रों में उत्पन्न होते हैं, जहाँ ये केबलें मानवीय गतिविधियों के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं।
- भू-राजनीतिक संकीर्ण मार्ग एवं विध्वंस: अंडर-सी केबलों का एक बड़ा भाग होरमुज़ जलडमरूमध्य तथा बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य जैसे सामरिक समुद्री संकीर्ण मार्गों से होकर गुजरता है।
- इन क्षेत्रों में क्षेत्रीय संघर्ष, भू-राजनीतिक तनाव अथवा विध्वंसकारी गतिविधियाँ वैश्विक इंटरनेट संपर्क को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं, जैसा कि हाल के लाल सागर संकट के दौरान देखा गया।
- लैंडिंग स्टेशनों का अत्यधिक संकेन्द्रण: भारत की लंबी तटरेखा होने के बावजूद अंडर-सी केबलों के लैंडिंग स्टेशनों का अत्यधिक भौगोलिक संकेन्द्रण एक प्रमुख जोखिम है।
- किसी स्थानीय प्राकृतिक आपदा, नियामकीय अवरोध अथवा समुद्री दुर्घटना की स्थिति में भारत की इंटरनेट बैंडविड्थ का बड़ा भाग प्रभावित हो सकता है।
- नियामकीय बाधाएँ एवं विलंब: अंडर-सी केबल परियोजनाओं के लिए संचालकों को दूरसंचार, गृह, रक्षा, पर्यावरण तथा मत्स्य पालन मंत्रालयों सहित अनेक विभागों से अनुमति प्राप्त करनी पड़ती है।
- स्वामित्व एवं सुरक्षा संबंधी कठोर नियम निजी क्षेत्र द्वारा परियोजनाओं के त्वरित क्रियान्वयन को कठिन बनाते हैं।
- मरम्मत क्षमता का अभाव: भारत के पास अंडर-सी केबलों की मरम्मत हेतु स्वदेशी क्षमता उपलब्ध नहीं है तथा उसे विदेशी मरम्मत पोतों पर निर्भर रहना पड़ता है।
- परिणामस्वरूप, परिवहन समय, अनुमति एवं प्रशासनिक स्वीकृतियों के कारण मरम्मत कार्य में अनावश्यक विलंब होता है।
सुझाव
- भारत को ऑस्ट्रेलिया एवं सिंगापुर जैसे देशों की सर्वोत्तम प्रथाओं का अनुसरण करते हुए अपनी तटरेखा पर “केबल संरक्षण क्षेत्र” घोषित करने हेतु उपयुक्त कानून बनाना चाहिए।
- इन क्षेत्रों में अंडर-सी केबलों के निकट व्यावसायिक मत्स्यन, ड्रेजिंग तथा जहाजों के लंगर डालने जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
- भारत को मुंबई एवं चेन्नई पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक समुद्री लैंडिंग स्टेशनों का तीव्र विकास करना चाहिए।
- विशाखापत्तनम (पूर्वी तट) तथा धुवरन (पश्चिमी तट) को वैकल्पिक लैंडिंग हब के रूप में शीघ्र विकसित किया जाना चाहिए, जिससे नेटवर्क में आवश्यक अतिरिक्त सुरक्षा एवं मार्ग विविधता सुनिश्चित हो सके।
- दूरसंचार विभाग (DoT) को सबमरीन केबल परियोजनाओं के लिए एकल-खिड़की स्वीकृति प्रणाली लागू करनी चाहिए, जिससे प्रशासनिक प्रक्रियाएँ सरल एवं त्वरित बन सकें।
- अनुमति प्रक्रियाओं को सरल बनाने से गूगल , मेटा तथा माइक्रोसॉफ्ट जैसी वैश्विक क्लाउड एवं एआई हाइपरस्केलर कंपनियों से बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित किया जा सकेगा।
- स्वदेशी केबल बिछाने एवं मरम्मत पोतों का विकास आर्थिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है।
- भारतीय नौसेना एवं भारतीय तटरक्षक बल को अपने समुद्री क्षेत्र जागरूकता तंत्र में अंडर-सी केबलों की निगरानी को सम्मिलित करना चाहिए तथा शत्रुतापूर्ण हस्तक्षेप की रोकथाम हेतु मानवरहित जलमग्न वाहन (UUVs) का उपयोग बढ़ाना चाहिए।
स्रोत :TH